वर्तमान समसामयिक में मीडिया की भूमिका

जिस देश का मीडिया युद्ध के नगाड़े बजाता हो , युद्ध का उन्माद पैदा करता हो तब पहला हमला उस देश के अपने ही नागरिकों की चेतना पर होता है … मीडिया के द्वारा तैयार की गई कलह-प्रिय धुन पर देश में बज रहा राफ़ेल-संगीत और उस पर झूमते लोग इस बात के प्रत्यक्ष गवाह हैं … इस कर्कश युद्ध-संगीत के शोर में देश की अब तक की सैन्य ताकत से लेकर राफ़ेल पर उठते सवाल मानो दब गए हैं मग़र क्या युद्ध के बाद की विभीषिका का अंदाज़ा भी है हमें ??

अब ना पड़ोसी देशों से मधुर संबंधों की ज़रूरत बची है , ना सीमाओं के विवादों पर तर्कपूर्ण चर्चा की गुंजाइश … शांति की ज़रूरत तो अब डस्टबिन में है और सवालों के लिए तो जगह है ही नहीं … है ना ?

एक देश खरीदने वाला और दूसरा बेचने वाला … बेचने वाले ने और भी देशों को यह फाइटर प्लेन बेचा है लेकिन झूम हम रहे हैं

क्यों ?
पूछिए मत !!

पूछेंगे तो देशभक्ति पर सवाल उठेगा … कोरोना मरीज 15 लाख से ज़्यादा हो गए पर सवाल मत करिए क्योंकि अभी देश में राफ़ेल-उत्सव चल रहा है

ताली , थाली बजाकर और दिए जला कर तृप्ति हो गई हो तो अब चिताएं जलाने की तैयारी कीजिए …

वो क्या है ना कि हम उत्सवी लोग हैं … चैनलों से भांग परोसी जाती है और हम नाचने लग जाते हैं , हम उत्सवी लोग हैं … अर्थव्यवस्था ,रोजगार वगैरह हमारे सोचने का विषय नहीं है , हम उत्सवी लोग हैं … कोई चुनी हुई सरकार गिरा दी जाए तो विधायक का रेट नहीं पूछेंगे बल्कि नाचते-गाते फिर वोट की लाइन में लग जाएंगे , हम उत्सवी लोग हैं … कभी पूछेंगे नहीं कि देश क्या सिर्फ राफ़ेल से बच जाएगा या मीडिया द्वारा प्रायोजित वैचारिक हमलों से भी देश को बचाने की ज़रूरत है … नहीं पूछेंगे हम , कभी नहीं पूछेंगे … है ना ?

राजभवनों की दहलीज पर पड़ा जीर्णशीर्ण लोकतंत्र हम लोगों को नज़र नहीं आएगा क्योंकि अभी हम उत्सवग्रस्त हैं , हो भी क्यों नहीं … आखिर अभी देश में राफ़ेल आ गया है , है ना ?

राफ़ेल के आगमन पर सत्ता से लेकर मीडिया के अधिकांश हिस्से तक ने संकटग्रस्त देश में जिस तरह त्योहार का माहौल खड़ा कर दिया वो चिंतित करने वाला है … पहले हमें बताया जाता है कि हम कितना असुरक्षित हैं और फिर राफ़ेल आ गया , अगर अन्धे नहीं हो तो “भय का व्यापार” देखिए … देख रहे हैं आप ??

जितना ज़रूरी देश की सीमाओं की सुरक्षा है क्या उतना ही ज़रूरी देश के भीतर लोकतंत्र की सुरक्षा नहीं है ?

कमज़ोर लोकतंत्र को ढहने से कोई राफ़ेल नहीं बचा सकेगा तो क्या अब हमारे लिए लोकतांत्रिक मूल्यों के पोषण की ज़रूरत गैर जरूरी हो गई है ?

मीडिया की स्वतंत्रता पर तमाम बहसें आत्मनियंत्रण पर जा कर खत्म हो जाती हैं … फासिस्ट देशों के मीडिया की हालत देख कर नेहरू ने इस बारे में अपने दौर में ही आगाह किया था लेकिन हम तेज़ी से उस दौर में जा रहे हैं जहां हर वक़्त हमें एक असुरक्षित देश दिखेगा , हर वक़्त हमें दुश्मन देश नज़र आएंगे ,हर वक़्त हमें अपनी सीमाएं खतरे में नज़र आएंगी , हर वक़्त हमारे सामने युद्ध के नगाड़े बजाता मीडिया होगा और हर वक़्त हम खुद को नागरिक से ज़्यादा मोर्चे पर तैनात एक सैनिक की तरह महसूस करेंगे और तभी राफ़ेल आ जायेगा और अकस्मात हमें सुरक्षा का बोध भी होगा लेकिन तब भी ना तो मीडिया का दायित्व-बोध मुद्दा होगा ,ना सरकार से सवाल करने की मीडिया की ज़िम्मेदारी पर सवाल होंगे और ना हम खुद को अमन पसंद या लोकतंत्र पसंद नागरिक की तरह ही देखना चाहेंगे …

दरअसल राफ़ेल-उत्सव एक संकेत है … ये संकेत है कि समाज को युद्ध-प्रिय बनाया जा रहा है , ये संकेत है कि मीडिया हमारे लोकतंत्र की रखवाली नहीं करेगा , मीडिया हमारी चेतना की परवरिश नहीं करेगा बल्कि मीडिया एक ऐसे औजार में तब्दील होता जा रहा है जिसका काम एक चेतना विहीन , हिंसक और रक्तपिपासु पीढ़ी तैयार करना रह गया है

राफ़ेल-उत्सव तो सिर्फ इशारा है … अगर हमारी चेतना पर ऐसे सुनियोजित हमले हो रहे हों तो ज़रूरी है कि हम खुद को थोड़ा झकझोरे , ज़रूरी है कि थोड़े सवाल करें … ज़रूरी है कि अतीत को कुरेदें और वर्तमान का विश्लेषण करें , ज़रूरी है कि हम बेहतर भविष्य की बात करें , ज़रूरी है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को सैन्यतंत्र के बजाए एक मजबूत लोकतन्त्र सौंपें … बिल्कुल हमें मजबूत सेना चाहिए , हमें आधुनिक हथियार भी चाहिए लेकिन इससे भी ज्यादा ज़रूरी है कि हमारी चेतना का सैन्यीकरण ना हो … इसलिए और भी ज़रूरी है कि हम राफ़ेल-उत्सव मना रहे मीडिया के मौकापरस्त गिद्धों और सत्ता से समझौता कर चुके श्वानों की ध्वनि पर नृत्य करना बन्द करें और यह देश जो द्रुत गति से “वास्तविक राष्ट्रवाद” को गर्त में धकेल कर “सैन्य राष्ट्रवाद” के वीभत्स रूप की ओर बढ़ रहा है उसे समय शेष रहते बचा सकें … बचा सकें उस महान राष्ट्र की संस्कृति में निहित उसके नैसर्गिक सौन्दर्य को जिसे दिन-प्रतिदिन बदसूरत और लहूलुहान किया जा रहा है … चाहे क्षीण ही सही परन्तु अपने स्तर पर कोशिश जरूर कीजिए उस देश को बचाने की जो आज अपनी ही सरकार का उपनिवेश बन गया है

यजुर्वेद में कठोपनिषद की इक्कीसवीं ऋचा में कहा गया है –

“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत:
क्षुरस्य निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति: …”

अर्थात “उठो , जागो और बोध को प्राप्त करो , छुरे की तीक्ष्णता का अवलम्बन लेकर निशीथ काल में दुर्ग की रक्षा का मार्ग कदापि श्रेयस्कर नहीं कहलाता है ”

अगर हम ग्रहण कर सकें तो बहुत व्यापक , गूढ़ और गहरे मायने हैं इस श्लोक के , इसके अतिरिक्त महाभारत के उद्योग पर्व के उन्नीसवें अध्याय में शांतिदूत श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि-
“युद्धो नैव शांतिः विकल्पं भवन्ति:” अर्थात युद्ध कभी भी शांति का विकल्प नहीं हो सकता

“सत्ताप्रहरी” और “राष्ट्रप्रहरी” बनने में अंतर होता है … हो सके तो इस अन्तर को समझने का प्रयास कीजिए 🙏

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